हम सब्ज़ी खरीदते वक्त ताज़गी देखते हैं। दाल में कीड़ा तो नहीं, यह देखते हैं। मसाले असली हैं या नहीं, यह सोचते हैं। लेकिन जिस तेल में यह सब पकता है, उसके बारे में हम शायद ही सोचते हैं।
रोज़ के खाने में हर चीज़ तेल से गुज़रती है। तड़का, करी, रोटी, तली हुई सब्ज़ी, सब में तेल है। और वो तेल जो आपकी रसोई में पहुँचा, उसे बनाने में क्या हुआ, यह जानना ज़रूरी है।

तेल सिर्फ वसा नहीं होता
किसी भी बीज या फल से निकाले गए प्राकृतिक तेल में सिर्फ फैटी एसिड नहीं होते। उसमें होते हैं:
- टोकोफेरॉल: विटामिन E का प्राकृतिक रूप, जो तेल में एंटीऑक्सिडेंट का काम करता है
- पॉलीफेनॉल: सरसों में isothiocyanate, तिल में sesamol और sesamin, ये यौगिक न सिर्फ खुशबू देते हैं बल्कि तेल को स्थिर भी रखते हैं
- फॉस्फोलिपिड: जिनमें lecithin शामिल है, जो naturally crude oil में होता है
- फाइटोस्टेरॉल: बीज के प्राकृतिक plant sterols
- वाष्पशील यौगिक: सैकड़ों ऐसे अणु जो तेल की खुशबू और स्वाद देते हैं
ये सब चीज़ें कोल्ड प्रेस्ड तेल में होती हैं, और रिफाइनिंग की हर प्रक्रिया में इनमें से एक-एक करके कुछ न कुछ हटाया जाता है।
गर्मी से टोकोफेरॉल को क्या होता है?
टोकोफेरॉल यानी विटामिन E का परिवार। ये तेल की प्राकृतिक संरक्षण प्रणाली है, यह तेल के पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड को ऑक्सीकरण (oxidation) से बचाता है।
कोल्ड प्रेस्ड मूंगफली तेल में प्रकाशित शोध के अनुसार 400–600 mg/kg तक टोकोफेरॉल होते हैं। रिफाइंड मूंगफली तेल में, रिफाइनिंग की प्रक्रिया के बाद, यह मात्रा 150–300 mg/kg तक गिर जाती है।
और क्योंकि रिफाइनिंग ने तेल के प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट हटा दिए, उनकी जगह TBHQ जैसे कृत्रिम एंटीऑक्सिडेंट डाले जाते हैं। यह एक कृत्रिम समाधान है उस समस्या का जो रिफाइनिंग ने खुद पैदा की।
पॉलीफेनॉल की बात
सरसों के तेल में glucosinolate से बनने वाले isothiocyanate यौगिक ठंडे दबाव में ही बनते हैं, जब myrosinase एंज़ाइम सक्रिय होता है। उच्च तापमान पर यह एंज़ाइम नष्ट हो जाता है।
तिल के तेल में sesamol, sesamin और sesamolin होते हैं, ये शक्तिशाली प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट हैं जो तिल तेल को असाधारण स्थिरता देते हैं, यहाँ तक कि गर्म करने पर भी। यही कारण है कि दक्षिण भारत में पारंपरिक रूप से तिल तेल में मुरुक्कू और सेव तलते हैं, यह तेल गर्म होने पर जल्दी खराब नहीं होता।
ये यौगिक कोल्ड प्रेस्ड तिल तेल में होते हैं। रिफाइनिंग में चले जाते हैं।
हम यह दावा नहीं करते कि इन यौगिकों से कोई विशेष स्वास्थ्य परिणाम होता है, उसके लिए नियंत्रित अध्ययन चाहिए जो भारतीय तेलों पर पर्याप्त नहीं हुए हैं। लेकिन यह हम कह सकते हैं: ये यौगिक बीज में हैं, कोल्ड प्रेस्ड तेल में हैं, और रिफाइंड तेल में नहीं हैं।
स्मोक पॉइंट का सच
रिफाइंड तेल के बारे में एक आम तर्क यह है: ‘उसका स्मोक पॉइंट ज़्यादा होता है, इसलिए तलने के लिए बेहतर है।’
यह आधा सच है।
फूड केमिस्ट Martin Grootveld के 2018 के शोध में पाया गया कि रिफाइंड सूरजमुखी तेल को 180°C पर 20 मिनट गर्म करने पर, नारियल तेल या मक्खन की तुलना में कहीं ज़्यादा हानिकारक aldehydes बने, भले ही उसका स्मोक पॉइंट ज़्यादा था।
ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि स्मोक पॉइंट यह नहीं बताता कि कौन-से तेल में ऑक्सीकरण कितना होगा। पॉलीअनसैचुरेटेड तेल (जैसे रिफाइंड सूरजमुखी) में ऑक्सीकरण ज़्यादा होता है, भले ही वो बाद में जले।
कोल्ड प्रेस्ड मूंगफली तेल का स्मोक पॉइंट 160–180°C है। रोज़ का भारतीय खाना इसी सीमा में पकता है। तड़का, भूनना, करी, सब इसी रेंज में।
तो रसोई के लिए निष्कर्ष क्या है?
घर की रसोई के लिए, जहाँ रोज़ाना का खाना बनता है, कोल्ड प्रेस्ड तेल पूरी तरह से पर्याप्त है। जहाँ रिफाइंड तेल सच में बेहतर है वो है बड़े पैमाने पर, लगातार, बहुत उच्च तापमान पर commercial deep frying, जो घर में होती नहीं।
घर में पकौड़े तलें, मछली तलें, कचोरी बनाएं, कोल्ड प्रेस्ड मूंगफली तेल इन सबके लिए काफी है।
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- कोल्ड प्रेस्ड तेल बनाम रिफाइंड: क्या अंतर है [→ ब्लॉग 2]
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