जब आप किसी तेल की दुकान पर जाते हैं या ऑनलाइन देखते हैं, तो कई तरह के दावे दिखते हैं, ‘कोल्ड प्रेस्ड’, ‘वुड प्रेस्ड’, ‘कच्ची घाणी’, ‘एक्सपेलर प्रेस्ड’। ये सब एक जैसे लगते हैं, लेकिन हैं नहीं।
इनमें सबसे पुराना और सबसे भरोसेमंद है, लकड़ी का कोल्हू। इसे कहीं ‘घाणी’ कहते हैं, कहीं ‘चेक्कू’, कहीं ‘गानुगा’, कहीं ‘कोल्हू’। नाम अलग हैं, लेकिन सिद्धांत एक है। और वो सिद्धांत सिर्फ परंपरा नहीं है, उसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक कारण है।

लकड़ी के कोल्हू की रफ्तार ही उसकी ताकत है
पारंपरिक कोल्हू में एक लकड़ी का शाफ्ट होता है जो एक लकड़ी या पत्थर के मोर्टार में घूमता है। बैल की रफ्तार से चलाया जाए तो यह 6–8 RPM पर काम करता है, यानी एक मिनट में केवल 6 से 8 चक्कर। मोटर से चलाए जाने पर भी अच्छे कारीगर इसी रफ्तार को बनाए रखते हैं।
इतनी धीमी रफ्तार में घर्षण से जो गर्मी बनती है, वो बहुत कम होती है। तापमान 35–45°C से ऊपर नहीं जाता।
और यहीं पर लकड़ी की एक खास बात काम आती है, लकड़ी की ऊष्मा चालकता (thermal conductivity) केवल 0.1–0.4 W/m·K होती है। स्टील की ऊष्मा चालकता 50 W/m·K से ज़्यादा होती है। मतलब, लकड़ी गर्मी को खुद में रोक लेती है, तेल तक पहुँचने नहीं देती। स्टील मशीन में गर्मी फैलती है। लकड़ी में नहीं।
इसीलिए, भले ही आज मोटर से कोल्हू चलाया जाए, लकड़ी की बनावट तेल को ठंडा रखती है।
मशीन कोल्ड प्रेस्ड का मतलब क्या है?
‘कोल्ड प्रेस्ड‘ का मतलब है कि तेल निकालते वक्त तापमान 49°C से नीचे रहा। यह एक स्टील मशीन में भी संभव है, अगर मशीन धीमी गति से चले और ऑपरेटर तापमान पर नज़र रखे।
लेकिन यहाँ असली सवाल है: क्या वो ऑपरेटर सच में ऐसा करता है?
कुछ ब्रांड करते हैं, और उनका तेल भी अच्छा होता है। लेकिन मशीन में स्टील से स्टील का संपर्क होता है, और तापमान 45–49°C तक पहुँच सकता है। लकड़ी के कोल्हू में वही तापमान 37–43°C रहता है। यह 6–12°C का अंतर उन यौगिकों के लिए मायने रखता है जो सबसे पहले उड़ते हैं, खुशबू देने वाले volatile compounds।
नतीजा यह है कि लकड़ी कोल्हू का तेल थोड़ा ज़्यादा महकदार और स्वादिष्ट होता है।
क्या यह फर्क बोतल में दिखता है?
हाँ, और जिन्होंने दोनों चखे हों वो तुरंत बताएंगे।
लकड़ी कोल्हू से निकले मूंगफली तेल में एक गहरी, भुनी हुई मूंगफली की महक होती है। स्टील मशीन कोल्ड प्रेस्ड तेल में भी यह महक होती है, लेकिन थोड़ी कम तीव्र।
सरसों के तेल में यह फर्क सबसे साफ दिखता है। कच्ची घाणी सरसों तेल वो तीखा, नाक में लगने वाला एहसास देता है जो बिहार-बंगाल-पंजाब की रसोई की पहचान है। स्टील मशीन में थोड़े ज़्यादा तापमान पर निकाला गया सरसों तेल उतना तीखा नहीं होता, क्योंकि वो volatile glucosinolate यौगिक गर्मी में कुछ उड़ जाते हैं।
यही तीखापन, यही खुशबू, यह असली कोल्हू की निशानी है।
एक्सपेलर प्रेस्ड और कोल्ड प्रेस्ड एक नहीं हैं
कई ब्रांड ‘एक्सपेलर प्रेस्ड’ लिखते हैं और इसे ‘कोल्ड प्रेस्ड’ की तरह प्रस्तुत करते हैं। यह सही नहीं है।
एक्सपेलर प्रेस्ड का मतलब है कि कोई रसायन इस्तेमाल नहीं हुआ, तेल सिर्फ दबाव से निकाला गया। लेकिन अगर मशीन तेज़ गति से चले, तो तापमान 80–100°C तक जा सकता है। ऐसे तेल को ‘कोल्ड प्रेस्ड’ नहीं कह सकते।
तो देखें: एक्सपेलर प्रेस्ड > बिना सॉल्वेंट के, लेकिन संभवतः गर्म। कोल्ड प्रेस्ड > बिना सॉल्वेंट के और 49°C से नीचे। लकड़ी कोल्हू > बिना सॉल्वेंट के, 35–45°C पर, सबसे धीमा और सबसे प्राकृतिक।
खरीदते वक्त क्या पूछें?
अगर कोई ब्रांड ‘कच्ची घाणी’ या ‘लकड़ी कोल्हू’ का दावा करे, तो ये सवाल पूछना सही है:
- निकालते वक्त तापमान कितना था? जो ब्रांड इसे मापते हैं, वो बताएंगे।
- प्रति किलो बीज से कितना तेल निकला? 350–400 मिलीलीटर, यह असली कोल्ड प्रेस्ड है। ज़्यादा मात्रा मतलब शायद ज़्यादा गर्मी।
- तेल कितने दिन चलता है? 9–12 महीने सही है। 2–3 साल मतलब या तो additives हैं या दावा झूठा है।
- तेल का रंग और गंध कैसी है? बोतल देखें, रंग हो, महक हो।
| हमारा मूंगफली और तिल तेल पारंपरिक लकड़ी कोल्हू पर निकाला जाता है। प्रक्रिया धीमी है, मात्रा कम है, लेकिन तेल असली है।standardcoldpressedoil.com/cold-pressed-groundnut-oil |
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