बिहार में एक कहावत है: ‘घाणी का तेल, घर का खेल।’ मतलब, जो तेल घर के पास के घाणी पर निकला हो, वही असली खाना पकाने का तेल है।
पंजाब में सरसों की फसल कटने के बाद गाँव की घाणी पर लंबी लाइन लगती थी। राजस्थान में मूंगफली की घाणी से निकला तेल सीधे मिट्टी के बर्तन में भरा जाता था। बंगाल में सरसों के कच्ची घाणी तेल के बिना माछेर झोल अधूरा है।
यह सिर्फ भावनाओं की बात नहीं है। इस परंपरा के पीछे एक ठोस वैज्ञानिक आधार है जिसे हम आज समझते हैं।

घाणी काम कैसे करती है, असल में
कच्ची घाणी एक लकड़ी की संरचना है, एक केंद्रीय लकड़ी का धुरा (shaft) जो एक लकड़ी या पत्थर के मोर्टार में घूमता है। बैलों से चलाई जाए तो यह 6–8 RPM पर काम करती है। इस धीमी रफ्तार में बीज पर दबाव पड़ता है, उनकी कोशिकाएं टूटती हैं, और तेल धीरे-धीरे बाहर आता है।
इस पूरी प्रक्रिया में तापमान 35–45°C से ऊपर नहीं जाता। यह वो सीमा है जिसके नीचे बीज के तेल में मौजूद लगभग सभी प्राकृतिक यौगिक स्थिर रहते हैं।
लकड़ी की ऊष्मा चालकता कम होती है, यानी यह गर्मी को तेज़ी से नहीं फैलाती। स्टील के विपरीत, लकड़ी का कोल्हू घर्षण की गर्मी को तेल तक नहीं पहुँचने देता।
अलग-अलग राज्यों में एक ही परंपरा
घाणी सिर्फ उत्तर भारत की परंपरा नहीं है, यह पूरे भारत में, अलग-अलग नामों से मौजूद थी:
- उत्तर भारत (UP, Bihar, Rajasthan, Punjab): घाणी / कोल्हू / कच्ची घाणी
- तमिलनाडु: चेक्कू (Chekku) / मरचेक्कू, लकड़ी का चेक्कू
- आंध्र प्रदेश / तेलंगाना: गानुगा (Ganuga), गानुगा नुने मतलब गानुगा पर निकाला मूंगफली तेल
- कर्नाटक: गाणिगा (Gaaniga)
- महाराष्ट्र: घाणी
हर क्षेत्र में अलग बीज, अलग स्वाद, अलग पहचान, लेकिन सिद्धांत एक। धीमा दबाव, कम गर्मी, कोई रसायन नहीं।
सरसों तेल और कच्ची घाणी: सबसे ज़रूरी जोड़ी
अगर आप समझना चाहते हैं कि कच्ची घाणी का असर तेल पर कितना गहरा होता है, तो सरसों तेल इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
सरसों के बीज में glucosinolate नाम के यौगिक होते हैं। जब बीज को ठंडे दबाव में पीसा जाता है, तो myrosinase नाम का एंज़ाइम सक्रिय होता है और glucosinolate को तोड़कर allyl isothiocyanate बनाता है, यही वो यौगिक है जो सरसों तेल की तीखी, नाक में चढ़ने वाली गंध के लिए ज़िम्मेदार है।
अगर तापमान ज़्यादा हो, तो myrosinase एंज़ाइम नष्ट हो जाता है और allyl isothiocyanate नहीं बनता। इसीलिए रिफाइंड सरसों तेल में वो तीखापन नहीं होता जो कच्ची घाणी के तेल में होता है।
जब आप बंगाली माछेर झोल बनाते हैं और उसमें कच्ची घाणी सरसों तेल डालते हैं, वो तेज़ महक जो उठती है, वही allyl isothiocyanate है। यह कोई दोष नहीं है। यह असली सरसों तेल की पहचान है।
औद्योगीकरण ने क्या बदला
1950 के दशक में जब बड़ी तेल मिलें आईं, तो घाणी पर आर्थिक दबाव बढ़ गया। एक घाणी जो एक दिन में 15–20 लीटर तेल बनाती थी, उसकी जगह एक मशीन ने ले ली जो एक घंटे में 100 लीटर बना सकती थी।
खाना सस्ता हो गया। तेल भी। लेकिन उस सस्तेपन की एक कीमत थी, स्वाद की, खुशबू की, और उस पहचान की जो हर क्षेत्र के खाने को अपना बनाती थी।
आज जो लोग कच्ची घाणी तेल खोज रहे हैं, वो उसी पहचान को वापस ला रहे हैं। और अब हमारे पास यह जानने के लिए विज्ञान भी है कि वो पहचान क्यों थी, क्या थी, और क्या हुआ जब वो गई।
आज की कच्ची घाणी: बैल नहीं, सिद्धांत वही
आज जो ब्रांड सच में कच्ची घाणी तेल बनाते हैं, उनमें से ज़्यादातर मोटर का उपयोग करते हैं, लेकिन वही धीमी RPM बनाए रखते हैं। लकड़ी का कोल्हू होता है, तापमान मापा जाता है, और उपज कम रहती है।
यह एक छोटे पैमाने का काम है। इसीलिए यह महंगा है। लेकिन जो तेल आता है, वो वही होता है जो पीढ़ियों पहले आता था, असली, बेमिसाल, और खाने को जीवंत बनाने वाला।
| हमारा सरसों तेल और मूंगफली तेल कच्ची घाणी पर निकाला जाता है, वही पुरानी विधि, वही असली स्वाद।standardcoldpressedoil.com/cold-pressed-mustard-oil |
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